एक दौड़ है एक होड़ है

हमने अपने को इतना व्यस्त कर लिया है यह सोचने का भी समय नहीं है की आख़िर कर क्या रहे हैं कर क्यों रहे हैं कर किस लिए रहे हैं एक दौड़ है एक होड़ है भाग रहे हैं बस जाना कहाँ है किसी को नहीं पता कोई कहीं पहुँचता भी नज़र नहीं आता किसी … Continue reading एक दौड़ है एक होड़ है

सुबह चार बजे की चाय

बात शायद 1994 के आसपास की है ख़ैर उस से ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ेगा मैं दिल्ली से जयपुर जा रहा था रात की बस थी 2x2 मेरी बग़ल वाली सीट पर एक बुज़ुर्ग बैठे थे बस चली तो कुछ बातें होने लगी आमतौर पर मैं देखता हूँ उम्र के इस पड़ाव पर लोग बहुत संतुष्ट … Continue reading सुबह चार बजे की चाय

विश्वास – भरोसा – Trust

अभी पिछले दिनों मैंने मेरी पत्नी को बच्चों से यह कहते सुना की बेटा किसी पर भी Blind Trust मत करो। मैंने वहीं उसे रोका और कहा देखो Blind Trust जैसी कोई चीज़ नहीं होती। या तो Trust विश्वास करो या मत करो। क्यूँकि मेरी समझ में यह अधूरा विश्वास ही विश्वासघात का बीज है। … Continue reading विश्वास – भरोसा – Trust

नकारतमकता और सकारात्मकता

नकारतमकता यानी negativity से हम राई का पहाड़ बना सकते हैं तो कोशिश कीजिए सकारात्मक positive सोच रखने की हमेशा ऐसा शायद सम्भव ना हो पर जहाँ तक हो सके प्रयास कीजिए आप positive रहें और positive energy release करें अच्छी vibes release कीजिए अच्छा सोचोगे अच्छा होगा और बुरा सोचोगे बुरा होगा नकारतमकता का … Continue reading नकारतमकता और सकारात्मकता

यहाँ सब किरायेदार हैं

ये ज़िन्दगी हमें किराए पे ही तो मिली है और हम ख़ुद को इसके मालिक समझ बैठते हैं। मेरी समझ में बस यहीं भूल हो जाती है। जैसे हम लोग जब किराए के मकान में रहते हैं तो मालूम होता है की कभी भी ख़ाली करना पड़ सकता है। ना मालूम मकान मालिक कब नोटिस … Continue reading यहाँ सब किरायेदार हैं

मीडिया ट्राइयल-ज़िम्मेवार कौन

हमारे पत्रकार आख़िर साबित क्या करना चाहते हैं ना किसी को चैन से जीने देते हैं और ना मरने। कई बार तो ऐसा लगता है नाहक ही हमने इतनी बड़ी न्यायिक व्यवस्था खड़ी की जिसमें न्याय मिलने में सालों लग जाते हैं जबकि हमारे पत्रकार केवल आधे या एक घंटे की बहस में दूध का … Continue reading मीडिया ट्राइयल-ज़िम्मेवार कौन

हमारी धारणाऐं, मान्यताऐं और कसौटियाँ

हमारी धारणाओं और मान्यताओं की वजह से हमने जीवन का सारा रस समाप्त कर दिया है। हमारी धारणाओं और मान्यताओं से हम अपनी अपनी कसौटी बनाते हैं और फिर सब कुछ उसी कसौटी पे परख के देखते हैं। यह कुएँ के उस मेंढक जैसी स्थिति है जिसे लगता है की उस कुएँ के बाहर कोई … Continue reading हमारी धारणाऐं, मान्यताऐं और कसौटियाँ

रिश्तों की अहमियत

कल रात एअरपोर्ट गया था पत्नी तीन दिन की एक कॉन्फ़्रेन्स से लौट रही थी पहले सोचा ड्राइवर को भेज दूँ फिर सोचा ख़ुद भी चला जाऊँ मुझे भी अच्छा लगेगा और पत्नी को तो बहुत अच्छा लगेगा सो मैं भी चला गया एअरपोर्ट अब पत्नी क्यूँकि सरकारी अधिकारी है तो एअर इंडिया से ही … Continue reading रिश्तों की अहमियत

क्या भगवान भरोसे रहा जा सकता है

 हम सबको एक ग़लतफ़हमी या ख़ुशफ़हमी घेरे रहती है की जिस धुरी पर पृथ्वी घूम रही है वो हम ही हैं हम ना होते तो क्या होता जो भी कर रहे हैं हम ही कर रहे हैं और लगातार पूरे जीवन यही अपना और अपने अहंकार का विज्ञापन जारी रहता है की मैंने ये कर … Continue reading क्या भगवान भरोसे रहा जा सकता है