एक दौड़ है एक होड़ है

हमने अपने को इतना व्यस्त कर लिया है यह सोचने का भी समय नहीं है की आख़िर कर क्या रहे हैं कर क्यों रहे हैं कर किस लिए रहे हैं एक दौड़ है एक होड़ है भाग रहे हैं बस जाना कहाँ है किसी को नहीं पता कोई कहीं पहुँचता भी नज़र नहीं आता किसी के मन में ये सवाल नहीं उठता क्या की ROI (Return on Investment) क्या है पैसे लगाते हैं तो सब सोचते हैं inflation (महँगाई की दर)  ROI हम ऐसी जगह पैसा लगाते हैं या लगाना चाहते हैं जहाँ हम inflation को मात दे सकें मतलब हमें ROI इनती मिले जो inflation से अधिक हो ताके हमारे पैसे की क़ीमत inflation की वजह से घटे नहीं मेरी समझ में पूँजी निवेश का एक सीधा सा सिद्धांत है Your investment should always beat inflation अगर ऐसा नहीं होगा तो हमारी पूँजी की value उसकी purchasing power घटती जाएगी

अब देखिए पूँजी निवेश के समय तो कितना सोचते हैं पर जब अपना जीवन दाँव पर लगाते हैं तब ROI का ख़्याल नहीं आता बस जीवन लगा देते हैं इस पूँजी के ROI के चक्कर में बिना कुछ सोचे समझे की यह जीवन क्या बस पूँजी निवेश की ROI समझने को मिला है शायद यही सोचते होंगे की जीवन मिला है मुफ़्त और पैसे पूँजी मेहनत से कमाई हैं तो दोनों में फ़र्क़ तो होगा ही मुफ़्त तो मुफ़्त ही है सो जीवन के ROI की कौन सोचे पूँजी की ROI का पूरा गणित तो हमारे पास है ही 

अब जीवन के ROI को समझना है तो हमें धर्म से जुड़ के देखना होगा पर हम लोग धन और धर्म के बीच एक खेल खेलते रहते हैं कहीं तो धर्म को इतना महत्व देते हैं कहीं धर्म बिलकुल गौण हो जाता है लगभग हम सभी के पैदा होने विवाह होने और मृत्यु होने पर धर्म हमें स्पर्श करता है 

मेरा यहाँ धर्म से तात्पर्य परमात्मा से है हालाँकि मुझे अब धर्म परमात्मा से जुड़ा दिखाई नहीं देता इसलिए मुझे धार्मिक ना हो कर आध्यात्मिक शब्द अधिक प्रिय है मेरी समझ में धार्मिक व्यक्ति का परमात्मा कण कण में विद्यमान नहीं हो सकता धार्मिक व्यक्ति ने अपने लिए परमात्मा स्वयं निर्मित किया है और अगर उसकी परमात्मा से भेंट हो भी जाए तो वह कहेगा नहीं जी देखिए मैं परमात्मा को सिर्फ़ तभी स्वीकार कर सकता हूँ जब वह मेरे हिसाब का हो क्या पागलपन है यार मतलब हम तो परमात्मा की भी परीक्षा ले लें की होंगे आप कहीं के परमात्मा पर हमारी किताब में तो ऐसे लिखा है ऐसा ही हो सकता है परमात्मा 

मुझे लगता है की जब हमने मनुष्य जाति ने धर्म का भव्य रूप देखा होगा और जब धर्म जीवन का अभिन्न अंग रहा होगा तो समाज अधिक सम्पन्न रहा होगा मेरी समझ में एक परमात्मा को मानने वाला व्यक्ति अपने आसपास किसी को कष्ट सहते नहीं देख पाएगा आज धर्म के ह्रास से लोग अपने परिवार की पीड़ा को भी नज़रंदाज़ कर देते हैं अपने माता पिता को भी कष्ट देते हैं तो आसपास के लोगों की तो बात ही छोड़ो परमात्मा और मानवता साथ साथ चलती है परमात्मा के प्रेम में पड़ा हुआ व्यक्ति कैसे अमानवीय कार्य करेगा यह सम्भव ही नहीं है उसका हृदय कोमल होगा वह करुणा से ओतप्रोत होगा वह कम कमाएगा पर किसी का हक़ मार कर नहीं खाएगा वह किसी दूसरे के हिस्से का धन अपने घर में नहीं लाएगा वह व्यक्ति दानवीर ना भी हो पर किसी की मजबूरी का फ़ायदा नहीं उठाएगा

मुझे नहीं मालूम कि जीवन के इस पड़ाव पर मेरे सामने यह सब सवाल क्यों उठ रहे हैं अब पता नहीं ये मेरा सोभाग्य है या कहीं इन सवालों के चलते मैं इस दौड़ में इस होड़ में पिछड़ जाऊँगा सब और भेड़ों का झुंड नज़र आता है सब भेड़ बिना सोचे समझे एक दूसरे के पीछे चल रही हैं और एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रही हैं मैंने सुना है भेड़ों के झुंड में कुछ कुत्ते भी होते हैं अब या तो मैं उन्ही कुत्तों में से एक कुत्ता हूँ पर ये पक्का है की भेड़ तो नहीं हूँ क्यूँकि अब भेड़ होना थोड़ा असहज हो गया है हालाँकि इस भेड़ों झुंड के साथ अभी तो चल ही रहा हूँ भेड़ के रूप में ना सही कुत्ते के रूप में ही सही पर अभी इस भेड़ों के झुंड से बाहर नहीं निकल पाया हूँ अभी कुछ सफ़र बाक़ी है शायद इसी भेड़ों के झुंड के साथ देखो कहाँ तक इस झुंड के साथ जाना है मैं यही सोभाग्य मानता हूँ की मुझे परमात्मा ने bird eye view दे कर इस भेड़ों के झुंड का आभास करवा दिया परमात्मा की अनुकंपा से मैंने अपने जीवन में आर्थिक अभाव भी देखा है और आर्थिक सम्पन्नता भी इन दोनों का रस लिए बिना किसी एक एक बारे में भी बात नहीं की जा सकती ना इन दोनों परिस्थतियों को समझा जा सकता अब देखते हैं आगे कहाँ जाना है जैसी परमात्मा की इच्छा 

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