हमारी धारणाऐं, मान्यताऐं और कसौटियाँ

हमारी धारणाओं और मान्यताओं की वजह से हमने जीवन का सारा रस समाप्त कर दिया है। हमारी धारणाओं और मान्यताओं से हम अपनी अपनी कसौटी बनाते हैं और फिर सब कुछ उसी कसौटी पे परख के देखते हैं। यह कुएँ के उस मेंढक जैसी स्थिति है जिसे लगता है की उस कुएँ के बाहर कोई दुनिया है ही नहीं। इस पृथ्वी पर हमारी लगभग सारी समस्याएँ झगड़े हमारी धारणाओं, मान्यताओं और कसौटियों की वजह से ही होते हैं। हम हर उस नई सोच या अलग बात को, विचार को, या दृष्टिकोण को नकार देते हैं जो हमारी धारणाओं और कसौटी पर खरा नहीं उतरती। हमारी धार्मिक आस्था, सामाजिक व्यवहार, राजनैतिक दृष्टिकोण सब कुछ हमारी धारणाओं, मान्यताओं और कसौटियों पर आधारित है। हमारे समाज का पूरा तानाबाना ऐसे ही बुना है।

हमने अपने अपने साँचे और खाँचे बना रखे हैं। जैसे माँ, पिता, पत्नी, पति, बेटा, बहु, बेटी, दामाद, लड़का, लड़की, दोस्त, प्रेमी, प्रेमिका, गुरु और चेला सब के साँचे या खाँचे हैं हमारे दिमाग़ में की वो कैसे होने चाहिएँ उन्हें कैसे व्यवहार करना चाहिए और अगर कोई थोड़ा सा भी इधर उधर हुआ तो हमारी परेशानी शुरू क्यूँकि हमारी धारणाओं, मान्यताओं और कसौटियों पर वह जो खरा नहीं उतरता वह ग़लत है और हम उसे स्वीकार नहीं कर सकते। और इसी से सब समस्या पैदा होती है एक धर्म की धारणाओं में दूसरे धर्म की धारणाओं की जगह नहीं है और इसीलिए एक धर्म दूसरे धर्म को ग़लत बताता है हमने अपने दायरे संकुचित कर लिए हैं अगर आज कृष्ण या राम या यीशु मसीह या पैग़म्बर मुहम्मद पैदा होंगे तो क्या वैसे ही दिखेंगे या कपड़े पहनेंगे? मेरी समझ में नहीं बिलकुल नहीं जब वह थे तो उन्होंने उस समय जो लोग खाते थे वही खाया और जो लोग पहनते थे वही पहना। आज अगर वो इस धरती पर आएँगे तो हम जैसे ही होंगे जैसा हम पहनते हैं खाते हैं मोबाइल भी होगा गाड़ी भी चलाते होंगे।

मेरी समझ में जो कुछ भी अद्भुत सुंदर इस पृथ्वी पर आज तक घटा वह उस समय की सारी धारणाओं और मान्यताओं को तोड़ के घटा वह चाहे अध्यात्म के क्षेत्र में हो धर्म के क्षेत्र में हो तकनीक के क्षेत्र में हो शिक्षा के क्षेत्र में हो जीव विज्ञान या चिकित्सा के क्षेत्र में हो मनोविज्ञान के क्षेत्र में हो और फिर जैसे होता आ रहा था वैसा फिर नहीं हुआ परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है जीवन परिवर्तनशील है फिर अपनी धारणाओं और मान्यताओं से बँध कर अपने विचारों को अवरुद्ध करना कहाँ तक सही है। अगर हम किसी भी बात को अपनी धारणाओं और मान्यताओं की कसौटी पर परखे बिना थोड़ा सा सहज भाव से सुनें तो पूरी पूरी सम्भावना है की हम कुछ नया सीख पाएँगे कुछ नया घटित होने देंगे। हमारी इन्ही धारणाओं, मान्यताओं और कसौटियों की वजह से हम हर किसी के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण बना लेते हैं।

भारत में पिछले 100 साल में कितने अविष्कार हुए लगभग ना के बराबर। हम माइक्रोसॉफ़्ट और गूगल चला तो सकते हैं आज दोनों के सी॰ई॰ओ॰ भारतीय हैं, पर बना नहीं सकते। मेरा मतलब इन कम्पनीयों का शुरुआती विचार हमारा नहीं था। जबकि इसी भारत ने प्राचीन समय में विश्व को शून्य और दशमलव की तरह बहुत कुछ दिया। ऐसा इसी लिए हुआ की हम एक संकुचित दायरे में क़ैद हो कर बैठ गए जो हमने अपनी इन्ही धारणाओं, मान्यताओं और कसौटियों की वजह खड़े किए हैं। मेरा यह कहना बिलकुल नहीं है की हमने कुछ किया ही नहीं पर जितनी हमारी क्षमता थी उसके मुक़ाबले कुछ भी नहीं किया।

आज हमारी शिक्षा व्यवस्था क्या है वह हमारे बच्चों की बुद्धि से अधिक उनकी याद रखने की क्षमता पर आधारित है। एक नपातुला पाठ्यक्रम है और उसी के गिर्द घूमती हमारी शिक्षा व्यवस्था, सम्भावना कहाँ छोड़ी है हमने किसी के कुछ सोचने की रट रट के सब याद करो और फिर उसे लिख आओ। समझा कौन रहा है, कोई कोशिश भी करे अलग से सोचने की तो उसे कहा जाता है की नम्बर/अंक नहीं आएँगे। बाक़ी सब तो फिर भी देखा जाए हम अपने बच्चों को भी धारणाओं, मान्यताओं और कसौटियों पर परखते हैं उन्हें भी नहीं बकश्ते और फिर उनके जीवन का सारा रस निचोड़ के उन्हें रुखा सूखा बना देते हैं।

हर किसी को उड़ने दो कोई बंधन कोई बेड़ियाँ मत डालो अपने अनुभव और विचार सब से साँझा कीजिए पर उनके अनुभव और विचार भी बिना अपनी धारणाओं, मान्यताओं और कसौटियों पर परखे बिना सुनिए। इस जीवन से रस मत निचोड़िए ज़रूरी नहीं की किसी एक ही विचारधारा से चिपके रहना। जीवन एक नदी है नहर नहीं। नदी अपना रास्ता बदलती रहती है मस्त हो के बहती रहती है वह प्रकृति की देन है नहर हमने बनाई है वह एक सुनिश्चित मार्ग पर बहती है वह कभी भी नदी जितनी सुंदर नहीं हो सकती। हर किसी को हर किसी स्वरूप में स्वीकार कीजिए हमारे जीवन में बहुत सम्भावना है।

मैं ख़ुद एक संकुचित दायरे में बँधा इंसान था हर किसी को अपने धारणाओं, मान्यताओं और कसौटियों पर परखता था पर धीरे धीरे समझने लगा और सब विचारों का सम्मान करने का प्रयास करता हूँ। अपने विचार भी व्यक्त करता हूँ। दूसरे के विचारों से मतभेद भी रखता हूँ पर खुले मन से सुनता हूँ और अगर मैं ग़लत हूँ तो मान भी लेता हूँ।

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