रिश्तों की अहमियत

कल रात एअरपोर्ट गया था पत्नी तीन दिन की एक कॉन्फ़्रेन्स से लौट रही थी पहले सोचा ड्राइवर को भेज दूँ फिर सोचा ख़ुद भी चला जाऊँ मुझे भी अच्छा लगेगा और पत्नी को तो बहुत अच्छा लगेगा सो मैं भी चला गया एअरपोर्ट

अब पत्नी क्यूँकि सरकारी अधिकारी है तो एअर इंडिया से ही यात्रा कर रही थी और जैसा की एअर इंडिया का नियम है की फ़्लाइट तो लेट ही होती है सो फ़्लाइट लेट ही थी तो मैं पत्नी के इंतज़ार में एअरपोर्ट पर टहल रहा था तभी देखा एक महिला अपने दो बच्चों के साथ गेट से बाहर आ रही थी थोड़े ग़ुस्से में थी मैंने उन महिला को अपनी बेटी को डाँटते हुए ये कहते सुना “Don’t behave like your father”

यह सुन कर हँसी भी आइ और ग़ुस्सा भी उन महिला के शब्द मुझे बेचैन कर रहे थे क्या हमें अपनी भाषा और अपने व्यवहार पर थोड़ा संयम नहीं रखना चाहिए माना पति पत्नी का सम्बंध कभी कभी थोड़ा, कभी ज़्यादा और कभी कभी बहुत ज़्यादा उलझ जाता है पर एक दूसरे को नीचा दिखाना या बच्चों को उस सब में पीसना कहाँ तक सही है।और सारा खेल EGO अहंकार का है

हर खेल के कुछ नियम होते हैं यहाँ तक की युद्ध के भी नियम होते हैं सो क्या हमें भी कुछ नियमों का पालन नहीं करना चाहिए

मैं अपनी बात करूँ तो अब मैं रिश्तों में बहुत कम उलझता हूँ पता नहीं मैं समय के साथ कमज़ोर हो गया हूँ या मुझे रिश्तों की क़द्र है या हो गई है या मैं समझदार हो गया हूँ पर अब किसी भी परिवार वाले से मित्र अगर कोई झगड़ा बहस हो जाए तो मैं आगे बढ़ के माफ़ी माँग लेता हूँ और यक़ीन मानिए बहुत हल्का महसूस करता हूँ अब चाहे ग़लती मेरी हो या किसी और की

देखिए मेरी समझ में इस दुनिया में कुछ भी मुफ़्त नहीं मिलता उसकी कुछ क़ीमत चुकानी पड़ती है इसी तरह हर रिश्ते की एक क़ीमत है जैसे समय, सब्र, पैसा, सहनशीलता, धैर्य, समझदारी, ईमानदारी, सच्चाई, माफ़ी, हँसी, ख़ुशी, त्याग, प्रश्चित, और झूठ। इन सब को मिला जुला के रिश्ते सम्भालने पड़ते हैं आप को झूठ थोड़ा अटपटा लग सकता है पर कुछ परिस्थितियों में यह बड़ा काम आता है। बच्चे को झूठ बोल कर हम क्या क्या नहीं कराते ऐसे ही बहुत बार झूठ का सहारा रिश्तों को बचा लेता है अब ये तो हम पर निर्भर करता है की झूठ का इस्तेमाल रिश्ता बचाने के लिए कारण है या तोड़ने के लिए। हमें रिश्तों की अहमियत को समझना चाहिए अपनी EGO अहंकार को थोड़ा भूल कर रिश्तों को बचा लेना ही समझदारी है बाद के पछतावे से कोई फ़ायदा नहीं

इसी विषय पर आप की क़सम फ़िल्म का आनंद बक्षी का लिखा किशोर कुमार का गाया आर. डी. बर्मन द्वारा निर्देशित यह गीत मुझे बेहद पसंद है

ज़िन्दगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मकाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते
ज़िन्दगी के सफ़र में…

फूल खिलते हैं, लोग मिलते हैं
फूल खिलते हैं, लोग मिलते हैं मगर
पतझड़ में जो फूल मुरझा जाते हैं
वो बहारों के आने से खिलते नहीं
कुछ लोग एक रोज़ जो बिछड़ जाते हैं
वो हजारों के आने से मिलते नहीं
उम्र भर चाहे कोई पुकारा करे उनका नाम
वो फिर नहीं आते…

आँख धोखा है, क्या भरोसा है
आँख धोखा है, क्या भरोसा है सुनो
दोस्तों शक दोस्ती का दुश्मन है
अपने दिल में इसे घर बनाने न दो
कल तड़पना पड़े याद में जिनकी
रोक लो रूठ कर उनको जाने न दो
बाद में प्यार के चाहे भेजो हजारों सलाम
वो फिर नहीं आते…

सुबहो आती है, रात जाती है
सुबहो आती है, रात जाती है यूँ ही
वक़्त चलता ही रहता है रुकता नहीं
एक पल में ये आगे निकल जाता है
आदमी ठीक से देख पाता नहीं
और परदे पे मंज़र बदल जाता है
एक बार चले जाते हैं जो दिन-रात, सुबहो-शाम
वो फिर नहीं आते…

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