क्या भगवान भरोसे रहा जा सकता है

 हम सबको एक ग़लतफ़हमी या ख़ुशफ़हमी घेरे रहती है की जिस धुरी पर पृथ्वी घूम रही है वो हम ही हैं हम ना होते तो क्या होता जो भी कर रहे हैं हम ही कर रहे हैं और लगातार पूरे जीवन यही अपना और अपने अहंकार का विज्ञापन जारी रहता है की मैंने ये कर दिया मैंने वो कर दिया मैंने इसके लिए ये किया उसके लिए वो किया इत्यादि इत्यादि

 

इस संदर्भ में एक बाबा जी से कुछ वर्ष पहले की मुलाक़ात आज याद आ गई ये बात पाण्डुकेश्वर की है ये जगह बद्रिनाथ जी के रास्ते में आती है जब यात्रा बंद होती है तो यहाँ से आगे रास्ता बंद होता है पाण्डुकेश्वर अलकनंदा जी के किनारे एक छोटा सा गाँव है

बात उन दिनों की है जब यात्रा बंद थी और हम इन बाबा जी के दर्शन करने के लिए ही पाण्डुकेश्वर गए थे बाबा जी एक हठ योगी थे पहले तो उन्होंने हमें लौटा दिया और कहलवाया की वह हमसे नहीं मिलना चाहते पानी पिलवाया चाय पिलवाई पर मिलने से मना कर दिया पर हम भी ढीठ की तरह डटे रहे हमने अपना परिचय दिया और बताया कि हम दिल्ली से केवल उन्ही से मिलने आए हैं और उनके एक शिष्य ने उनके बारे में बताया था और जब से बताया हम उत्सुक हैं उनसे मिलने को और इसी लिए जबकी यात्रा बंद है फिर भी केवल उन्हीं से मिलने आए हैं थोड़ी देर में बाबा जी ने बुलवा लिया 

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बाबा जी  बाहर से सख़्त और अंदर से बिलकुल कोमल थे थोड़ी देर में बाबा जी से खुल कर बातें होने लगी मैंने बहुत से सवाल पूछे पर जो सबसे महत्वपूर्ण सवाल थे की:

 1. क्या आप जो कर रहे हैं सही कर रहे हैं मेरा तात्पर्य उनके सन्यासी होने से था

2. क्या दुनिया में सब लोग अगर भगवा पहन लें तो यह कैसी दुनिया होगी

3. आप कोई काम धन्धा क्यूँ नहीं करते

4. और सब से महत्वपूर्ण सवाल था की क्या भगवान भरोसे रहा जा सकता है

और कुछ और इसी तरह के और सवाल मेरे मन में इस तरह के सवाल बचपन से उठते रहे हैं और मुझे जहाँ भी मौक़ा मिला मैंने इन सवालों के उत्तर तलाश किए

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वे बोले तुम यहाँ क्यूँ आए हो क्या मैंने बुलाया मैंने कहा नहीं मेरी उत्सुकता मुझे आप तक लायी वो बोले जिसने तुम्हें यहाँ भेजा वही सब करने वाला है और वही सब करता है या कराता है हमारा भ्रम है की हम करते हैं

बस वे इस विषय पर और नहीं बोले हो सकता है इतना भी ना बोले हों पर उन्होंने बहुत कुछ मुझ तक convey कर दिया जो बिना अधिक कहे मैं समझ भी गया। वे जब बोलते थे तो बिलकुल सरल सटीक और छोटा सा वाक्य बोलते थे बिलकुल to the point बिलकुल precise  

जिस दिन मैं उन से मिला उनके शरीर का लगभग आधा हिस्सा काम नहीं कर रहा था, शायद बायाँ हिस्सा, पूछने पर पता चला की वे गहन योग मुद्रा से उठ कर अचानक पानी में कूद गए शरीर बहुत ज़्यादा गरम था और पसीना भी बहुत आया था अचानक ठंडे पानी में जाने से उनका आधा हिस्सा काम करना बंद कर दिया था। जब मैंने उन से पूछा तो मासूम बच्चे की तरह बोले मैंने शरारत की और उसने मुझे सज़ा दी, हो जाएगा ठीक धीरे धीरे वो हम सुनते हैं ना Child Like हो जाइए सहज हो जाइए बच्चों के जैसे सरल हो जाइए जीवन को अपने में प्रवाहित होने दीजिए साक्षी भाव रखिए ये सब उन बाबा जी में मैंने पाया था मैं उनकी और टकटकी लगाए देखता जा रहा था और सोच रहा था इतना सरल कैसे हुआ जा सकता है  

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वहीं मुझे पता चला की जो स्थानीय पोस्ट ऑफ़िस के पोस्ट मास्टर हैं वह ना जाने कितने सालों से उनके लिए दूध ले कर आते हैं कैसा भी मौसम क्यूँ ना हो सुबह 11.00 बजे से पहले बाबा जी के लिए दूध पहुँच जाता है ऐसा ही बहुत कुछ पता चला और वह सरल से बाबा जी एक छोटी सी कुटिया में लगभग गुमनाम सी ज़िंदगी बिता रहे थे इतने सरल व्यक्तित्व से मिलन बड़े सोभाग्य की बात है 

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वहाँ यह भी पता चला की कुछ खोजी प्रवृति के लोग उनसे योग सीखने आ जाते थे पर टिक कोई कोई पाता था बाबा जी ना नमक खाते ना चीनी हमें उन्होंने जो दोपहर का भोजन कराया उसमें दाल थी पनीर था कुछ मिठाई भी थी मतलब आप यूँ समझिए जंगल में मंगल जब हम आने लगे तो बाबा जी ने हमें प्रसाद दिया जिसमें बादाम अखरोट किशमिश मिश्री सब कुछ था और वो भी मुट्ठी भर भर के

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अब इस सब का इंतज़ाम कौन कर रहा था कोई प्रचार नहीं उनकी कुटिया तक पहुँचने का कोई आसान रास्ता नहीं आसानी से वो बाबा जी किसी से मिलते नहीं फिर कोई तो था जो उनकी ज़रूरतें पूरी कर रहा था ताकि वे अपना सारा ऊर्जा अपनी भक्ति ध्यान या योग में लगा सकें मुझे उनसे मिल कर यह समझ आ गया की वाक़ई भगवान भरोसे रहा जा सकता है

वैसे इस शब्द भगवान भरोसे को अधिकतर negative way में प्रयोग किया जाता है जैसे यह देश भगवान भरोसे चल रहा है इत्यादि लेकिन यदि हम इसे समझने का प्रयास करें तो हमारे हाथ में क्या है जन्म है? नहीं मृत्यु है? नहीं अब जब यह दो बातें हमारे हाथ में नहीं हैं तो फिर क्या है हमारे हाथ जिसको हम भगवान भरोसे नहीं छोड़ सकते जन्म भगवान भरोसे और मृत्यु भगवान भरोसे ना जन्म पे हमारा बस यानी कौन कहाँ कब पैदा होगा और ना मृत्यु पे हमारा बस यानी किसकी कहाँ कब और कैसे मृत्यु होगी

अब सवाल उठता है की भगवान भरोसे होने का क्या मतलब है मेरी समझ में मतलब साफ़ है। अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को सुनिए और जैसा वहाँ से दिशानिर्देश मिले आगे बढ़ते जाइए। अब आप अंतरात्मा की आवाज़ साफ़ साफ़ सुन सकें इसके लिए ध्यान Meditation ही एक उपाय है। और ध्यान से आप सरलता से भगवान भरोसे हो पाएँगे। मैं जो बोल रहा हूँ पूरी ज़िम्मेवारी और विश्वास के साथ बोल रहा हूँ और पूरी प्रमाणिकता के साथ बोल रहा हूँ। रास्ता कठिन नहीं है पर हमें कुछ दूर चलना होगा। फिर रास्ता साफ़ हो जाएगा आपने देखा होगा जब हमारे रास्ते में कोई बड़ा शहर आता है और उस शहर से हो कर हमारा रास्ता जाता हो तो उसके पार निकलने में काफ़ी समय लग जाता है कई बार ग़लत रास्ता भी ले लेते हैं किसी से पूछते भी है आजकल गूगल बाबा की भी मदद लेते हैं पर एक बार शहर से बाहर सीधे रास्ते पर गाड़ी चल पड़े तो फिर भले ही गाड़ी को cruise control में डाल दीजिए। ऐसे ही ध्यान की शुरुआत में थोड़ा समय लग सकता है यह इस बात पर भी निर्भर करता है की आपके दर्पण पर कितनी धूल है आप के मन पर कितना मैल चढ़ा लिया है आप ने आप का baggage कितना भारी है तो धूल हटाने मैल निकालने और baggage को हल्का करने में समय तो लगेगा ही पर फिर आपके भगवान भरोसे होने की शुरुआत हो पाएगी मैं भी अभी प्रयास कर रहा हूँ पर मेरी अंतरात्मा से मुझे इस अनुभव को साझा करने की प्रेरणा मिली सो अपना अब तक का अनुभव साझा कर रहा हूँ

यह मेरा पहला ब्लॉग पोस्ट है जो मन में आया लिख दिया

आप के कामेंट्स, सुझाव और आलोचना मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण होंगे।

6 thoughts on “क्या भगवान भरोसे रहा जा सकता है

  1. श्रीमन मानजी यह आपकी अंतरात्मा की आवाज़है जो आपने यहाँ बयान किया है। और ये यथार्थ सत्य भी है। परंतु जीवन के आपाधापि में हम कभी-कभी भटक जाते हैं और हमें लगता है की सारे काम हम कर रहें है। लेकिन हम सब इस जीवन रूपी रंगमंच में सिर्फ़ कठपुतली मात्र हैं।

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